Thursday, 22 October 2015

धर्म

धर्म तो चाहे राम का हो या पॉटर का जीने का एक तरीका सिखाता है ,
बुराई पर अच्छाई की जीत का एक आईडिया समझाता है। 

यह वो समय है

यह वो समय है जब 
कट  चुकी है फसल 
और नया बोने का दिन नहीं 
खेत पड़े हैं उधारे
अन्यमन्सक है  मिटटी सहसा धुप में पड  कर -
हर थोड़ी दूर पर मेंडो की छाँह 
चमकती है कटी खूँटियाँ 
दूर  पर चरती भेड़ो के रेवड़ 
और मुसकोल
और चीटियों के बिल के बाहर मिटटी चूर 
यह वो समय है जब 
शेष हो चुका है पुराना 
और नया आने को शेष है 
  - अरुण कमल 
(शाहित्य अकादमी अवार्ड विनर) 

Saturday, 17 October 2015


HAPPINESS CAN BE FOUND ,EVEN IN THE DARKEST OF TIMES,IF ONE ONLY REMEMBERS TO TURN ON THE LIGHT.
                        -ALBUS DUMBLEDORE

Sunday, 27 September 2015

"टोबा टेक सिंह"


मुझे वागाह पे टोबा टेक सिंह वाले "बिशन " से जा के मिलना है 
सुना है वो अभी तक सूजे पैरॉ पर खड़ा है 
जिस जगह "मंटो " ने छोड़ा था उसे 
वो अब तक बुदबुदाता है 
"ओप्पड़  दी गुड़ गुड़ दी मूंग दी दाल दी लालटेन "
पता लेना है उस पागल का 
ऊंची डाल पर चढ़ कर जो कहता है 
खुदा है वो उसे फैसला करना है  किस का गाँव किस के हिस्से में आयेगा  
वो कब उतरेगा अपनी डाल से 
उसको बताना है 
अभी कुछ और भी दिल हैं  के जिन को बाँटने का ,काटने का काम ज़ारी है 
वो बटवारा तो पहला था अभी कुछ और बंटवारे बाकि हैँ 
मुझे वागाह पे टोबा टेक सिंह वाले बिशन से जा के मिलना है 
खबर देनी है उसके दोस्त फ़ज़ल को 
वो "लहना सिंह ","वधावा सिंह " वो "बेहेन अमृत"
वो सरे क़त्ल हो कर इस तरफ आये थे 
उन की गर्दनें सामान ही में लुट गयी पीछे 
ज़बह कर के वो "भूरी " अब कोई लेने न आएगा 
वो लड़की इक उंगली जो बड़ी होती थी हर बारह महीने में 
वो अब हर इक बरस इक पोटा पोटा घटती रहती है 
बताना है के सब पागल पहुंचे नहीं अपने ठिकानो पर 
बहुत से इस तरफ़ भी हैं बहुत से उस तरफ भी हैं 
मुझे वागाह पे टोबा टेक सिंह वाला बिशन अक्सर यही कह के बुलाता है 

"ओप्पड़ दी गुङ  गुङ दी मूंग  दी दाल दी लालटेन दी हिंदुस्तान ते पाकिस्तान दी दूर फिट्टे मुंह " 

Friday, 25 September 2015

हिन्दू या मुस्लमान के अहसासात को मत छेड़ीए  
अपनी  कुर्सी के लिए जज्बात को  मत छेड़िए  
हममे कोई हूण,कोई शक ,कोई मंगोल है   
दफ़न है जो बात ,अब उस बात को मत छेड़िए   
गलतियाँ  बाबर की थी ,जुम्मन का घर फिर क्यों जले   
ऐसे नाजुक वक़्त में हालात को मत छेड़िए 
है कहाँ हिटलर ,हलाकू , जार या चंगेज खाँ 
मिट जाए सब ,कौम की औकात को मत छेड़िए
छेड़िए इक जंग ,मिल -जुल कर गरीबी के खिलाफ 
दोस्त मेरे मजहबी नगमात को मत छेड़िए 
                                             -आदम जोंडवी 

Tuesday, 22 September 2015

"सुबह सुर्ख आएगी ,बस रात चलती रहे
बहस होती हो तो हो ,बस बात चलती रहे "

Saturday, 19 September 2015

"इस देश में सब कुछ सार्वजनिक है और कुछ भी सार्वजनिक नहीं। "